खोइछा

खोइछा देकर विदाई उत्तर भारत की एक पवित्र लोक-परंपरा है, जो बेटी की विदाई और मंगलकामना से जुड़ी है। यह परंपरा सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं को दर्शाती है।

खोइछा देकर विदाई

भारतीय लोक-जीवन में परंपराओं का विशेष महत्व है। ऐसी ही एक भावनात्मक और सांस्कृतिक परंपरा है खोइछा देकर विदाई। यह परंपरा विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मिथिलांचल क्षेत्र में प्रचलित है। जब बेटी विवाह के बाद मायके से ससुराल के लिए विदा होती है, तब यह रस्म निभाई जाती है।

खोइछा” शब्द का शाब्दिक अर्थ है साड़ी या दुपट्टे का फैला हुआ आँचल। इस आँचल में माँ, भाभी या घर की बुजुर्ग महिलाएँ दूर्वा, हल्दी, चावल, सिक्के या कुछ पैसे रखती हैं और बेटी के सुखी जीवन की कामना करती हैं। इसे बेटी के लिए आशीर्वाद और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है।

लोक-मान्यता के अनुसार बेटी को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। खोइछा देने की परंपरा इसी विश्वास से जुड़ी है कि बेटी के विदा होने से घर की समृद्धि बनी रहे और बेटी जहाँ जाए, वहाँ खुशहाली आए। यही कारण है कि यह रस्म केवल विदाई के समय ही नहीं, बल्कि बहू के मायके लौटते समय भी निभाई जाती है।

अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा के नाम भिन्न हैं। मिथिलांचल में इसे खोइछा, गुजरात और महाराष्ट्र में वट या ओटी भरना, तथा बंगाल में आँचल देना कहा जाता है। भले ही नाम अलग हों, लेकिन भाव एक ही है – ममता, आशीर्वाद और संस्कार

समय के साथ परिधान बदले हैं। आज कई स्थानों पर साड़ी के स्थान पर रूमाल या स्टोल में भी खोइछा दी जाने लगी है, लेकिन परंपरा का भाव आज भी जीवित है। यही परंपरा भारतीय संस्कृति को विशेष बनाती है।

खोइछा देने की परंपरा क्या है?

: बेटी की विदाई के समय आँचल में शुभ वस्तुएँ रखकर आशीर्वाद देना खोइछा परंपरा कहलाता है।

खोइछा में क्या-क्या रखा जाता है?

दूर्वा, हल्दी, चावल, सिक्के या पैसे।

खोइछा का सांस्कृतिक महत्व क्या है?

यह बेटी के सुख, समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना का प्रतीक है।

 क्या यह परंपरा आज भी प्रचलित है?

हाँ, आज भी कई क्षेत्रों में यह परंपरा निभाई जाती है।

ये तो चिंदी है






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